इस योद्धा से डर कर श्री कृष्णा छोड़ भागे मथुरा

इस योद्धा से डर कर श्री कृष्णा छोड़ भागे मथुरा

आपने महाभारत काल के अनेकों महावीर योद्धाओं के बारे में तो सुना ही होगा मगर क्या आप एक ऐसे महावीर के बारे में जानते है जिसने एक नही बल्कि दो माँओ की कोक से जन्म लिया था।

मगध के राजा बृहद्रथ की दो पत्निया थी किन्तु किसी भी पत्नी से कोई भी संतान ना होने के कारण महाराज बृहद्रथ काफी चिंतित रहते थे।

एक दिन महाराज बृहद्रथ अपनी इस चिंता को लेकर महा ऋषि चंड़ कौशिक के पास पहुंचे और अपनी सारी परेशानी विस्तार से सुनाइ महा ऋषि  चंड़ कौशिक ने महाराज की  समस्या सुनी और समस्या के समाधान हेतु महाराज को एक फल दिया और कहा कि इस फल को ले जाकर अपनी रानी को खिला देना।

महाराज बृहद्रथ ने अपनी दोनों रानियों को उस फल को आधा-आधा काट कर खिला दिया। परिणाम स्वरूप दोनों रानियों ने आधे आधे शरीर वाले बच्चों को जन्म दिया। आधे शरीर वाले बच्चे को देखकर दोनों रानियां काफी डर गई और रानियों ने सैनिकों से कहकर उन दोनों आधे-आधे शहीरो को महल के बाहर फिक्वा दिया।

महल के पास से जा रही है एक राक्षसी ने बच्चे के आधे आधे शरीर को मांस का टुकड़ा समझ कर उठा लिया और जैसे ही दोनों टुकड़ों को राक्षसी ने दोनों हाथों में उठाकर एक साथ किया तो दोनों शरीफ जुड़ गए और बच्चा जीवित हो उठा और जोर जोर से रोने लगा। बच्चे की रोने की आवाज सुनकर दोनों रानी राक्षशी के पास पहुंची तो राक्षसी के हाथ में एक जीवित बचा था, वह समझ गई कि वह उन्हीं का बालक है। दोनों रानियों ने उस बच्चे को राक्षसी से ले लिया वही पीछे-पीछे महाराज भी पहुंच गए और जब उन्होंने उस राक्षसी से उसका नाम पूछा तो राक्षशी ने अपना नाम जरा बताया और महाराज ने अपने पुत्र का नाम उसी राक्षशी के नाम पर रख दिया जरासंध।

जरासंध को बाल्यावस्था से ही मल्लयुद्ध का काफी शौक था और वह बड़े होकर अपने समय के सबसे बड़े मल योद्धा बने।

इतिहास में आपको जरासंध की पत्नी के बारे में सुनने को नहीं मिलेगा जरासंध के चार बच्चे थे जिनमें दो पुत्र जिनका नाम सहदेव व जयंतसेन था और दो पुत्रियां जिनका नाम अस्ति और प्राप्ति था। जरासंध ने अपने मित्र बाणासुर के कहने पर अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह मथुरा के परम प्रतापी राजा कंस के साथ किया था।

श्री कृष्ण द्वारा कंस वध के बाद श्री कृष्ण को  मगध नरेश जरासंध अपना सबसे बड़ा बेरी मान बैठे थे। जिसके बाद जरासंध ने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया किंतु जरासंध ने हर बार श्री कृष्ण और बलराम के हाथों पराजय का स्वाद चखा।

दोस्तों जरासंध को युद्ध में मारा नहीं जा सकता था इसलिए वह बार-बार पराजित होने के बावजूद भी मथुरा पर आक्रमण करता रहता था। इससे परेशान होकर श्री कृष्ण ने मथुरा छोड़ने का फैसला लिया और देव शिल्पी विश्वकर्मा से द्वारिका नगरी का निर्माण करने को कहा जिसके बाद श्री कृष्ण मथुरा छोड़कर द्वारिका चले गए

जरासंध महादेव का अनन्य भक्ति था जरासंध ने अपने बल और पराक्रम से 86 राजाओं को परास्त कर अपना बंदी बना लिया था और अपने पहाड़ी वाले किले में उन्हें कैद कर रखा था। जरासंध महादेव को खुश करने के लिए और चक्रवर्ती राजा बनने की अभिलाषा से 100 राजाओं की बलि देकर चक्रवर्ती राजा बनना चाहता था। जरासंध की यह योजना पूर्ण भी हो जाती यदि श्री कृष्ण द्वारा जरासंध को मारने की युक्ति ना सोची जाती।

एक दिन श्री कृष्ण भगवान अर्जुन और भीम को साथ लेकर ब्राह्मण का भेस भरकर जरासंध के पास पहुंचे जरासंध ने तीनों ब्राह्मणों से अपनी इच्छा व्यक्त करने के लिए कहा तो श्री कृष्ण भगवान ने कहा कि मेरे दोनों साथियों का मौन व्रत है। वह अपना मौन व्रत मध्यरात्रि के बाद ही खुलेंगे जरासंध ने ब्राह्मण भेज धारी श्री कृष्ण भगवान को वचन दिया कि वह मध्य रात्रि में उनके पास आकर उनकी इच्छा जरूर पूछेगा और अपने सेवक से तीनों ब्राह्मणों को ब्राह्मण कक्षा में ठहराने और सेवा करने के लिए कहा। मध्यरात्रि के बाद जरासंध तीनों ब्राह्मणों के पास पहुंचा। जरासंध को तीनों ब्राह्मणों पर शक हो चुका था कि यह लोग ब्राह्मण के रूप में जरूर कोई क्षत्रिय हैं। तब जरासंध ने तीनों से अपना असली परिचय देने के लिए कहा श्री कृष्ण भगवान ने अपना असली परिचय दे दिया इसके बाद श्री कृष्ण भगवान जरासंध को भीम के साथ द्वंद युद्ध के लिए ललकारा। जरासंध ने चुनौती को स्वीकार किया और अगले दिन दोनों के बीच द्वंद युद्ध शुरू हो गया दोनों के बीच 23 दिनों तक यूं ही युध्द चलता रहा। 24 वे दिन भीम जरासंध से युद्ध करते करते थक चुके थे, तब श्री कृष्ण भगवान ने भीम की तरफ घास के तिनके को बीच से दो भागों में फाड़ कर फेंक कर इशारा किया। तभी भीम समझ गए और उन्होंने ठीक वैसा ही किया और जरासंध को भीम ने बीच से फाड़ कर फेंक दिया किंतु दोनों टुकड़े फिर से आपस में जुड़ गए और जरासंध जीवित हो उठा। भीम ने फिर दोबारा वैसा ही किया किंतु इस बार भी जरासंध वापस जीवित हो उठा इस बार श्रीकृष्ण ने भीम की ओर घास के तिनके को बीच से फाड़कर विपरीत दिशा में फेक कर इशारा किया। भीम समझ गए और भीम ने जरासंध को बीच से फाड़कर दाहिने हिस्से को बाई ओर और बाएं हिस्से को दायिनी ओर फेंक दिया और अंत में जरासंध मृत्यु को प्राप्त हुआ।

जरासंध वध के बाद श्री कृष्ण भगवान ने 86 राजाओं को जरासंध के अत्याचारों से मुक्त कर दिया और जरासंध के पुत्र सहदेव को मगध का राजा बना दिया। 

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