बिरजू महाराज का हृदय गति रुकने से निधन

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बिरजू महाराज का हृदय गति रुकने से निधन

बिरजू महाराज : कथक में महारत की चाह को समर्पित जीवन
नई दिल्ली। पंडित बिरजू महाराज ने कथक से इस कदर प्यार किया, जैसा शायद ही कभी किसी ने किया हो। शास्त्रीय नृत्य कला में हासिल महारत ने उन्हें भारत के महानतम कलाकारों में शुमार किया। कला प्रेमियों के दिलों में वह हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गए। पंडित बिरजू महाराज तबला, हार्माेनियम और घुंघरुओं की झंकार के बीच पले-बढ़े। 17 जनवरी को तड़के जब उन्होंने अंतिम सांस ली, तब भी उनका घर संगीत से गुंजायमान था। वहां उनके पसंदीदा पुराने हिंदी गाने बजे रहे थे। नृत्य को समर्पित उनके जीवन के आखिरी पलों को याद करते हुए पंडित बिरजू महाराज की पोती रागिनी ने कहा, उन्होंने रात का भोजन लिया। इसके बाद हम अंताक्षरी खेलने लगे, क्योंकि उन्हें पुराने हिंदी गाने बहुत पसंद थे… अचानक उनकी सांसें असामान्य हो गईं। हमें लगता है कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था, क्योंकि वह दिल के मरीज थे। अपने आखिरी पलों में वह हंसते-मुस्कराते दिखे। वह चार फरवरी को 84 साल के हो जाते।
पंडित बिरजू महाराज ने कथक को न सिर्फ विश्व पटल पर पहचान दिलाई, बल्कि अपनी कला को कई पीढ़ियों के छात्रों तक भी पहुंचाया। वह एक उत्कृष्ट कलाकार होने के साथ ही शानदार कवि भी थे और बृजश्याम के नाम से कविताएं लिखते थे। उन्हें ठुमरी सहित गायकी के अन्य रूपों में भी महारत हासिल थी। पंडित बिरजू महाराज एक शानदार वादक भी थे और कुछ वाद्य यंत्र बजाते थे। लेकिन कथक उनके जीवन का ध्एय बन गया। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस नृत्य कला को देश-दुनिया के लिए पहचान दिलाने में समर्पित कर दिया।
बृजमोहन नाथ मिश्रा के रूप में जन्मे पंडित बिरजू महाराज अपने शानदार फुटवर्क और भाव-भंगिमाओं के बलबूते मंच पर राज करते थे। उन्होंने एक बार बताया था कि तीन साल की उम्र से ही उनके पैर उन्हें तालीमखाने की ओर खींच ले जाते थे, जहां बच्चों को नृत्य के साथ-साथ तबला व हार्माेनियम बजाना सिखाया जाता था।
परिचय
लखनऊ में अपने पुश्तैनी मकान में पलते-बढ़ते वह बृजमोहन नाथ मिश्रा से कब बिरजू महाराज बन गए, पता ही नहीं चला। एक साक्षत्कार में कथक सम्राट ने कहा था, हमारा घर सुर और ताल के सागर जैसा था। सात पीढ़ियों से वहां संगीत के अलावा किसी और विषय पर चर्चा नहीं होती थी। लय, स्वर, ताल, भंगिमा, सौंदर्य और नृत्य ही वह सब कुछ था, जिसके बारे में हम बात करते थे।
प्रख्यात कथक नर्तक अच्छन महाराज के घर में जन्मे बिरजू महाराज ने सात साल की उम्र से प्रस्तुति देनी शुरू कर दी थी। अच्छन महाराज का असली नाम जगन्नाथ महाराज था। बिरजू महाराज ने अपने पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू महाराज व लच्छू महाराज से कथक की बारीकी सीखी थी। बचपन से ही वह अपने पिता के साथ कानपुर, प्रयागराज और गोरखपुर प्रस्तुति देने जाया करते थे। उन्होंने मुंबई और कोलकाता में भी पिता के साथ मंच साझा किया।
पिता के निधन के बाद 13 साल के बिरजू महाराज दिल्ली जा बसे। परिवार को पालने के लिए वह संगीत भारती में कथक सिखाने लगे। उन्होंने दिल्ली के भारतीय कला केंद्र और कथक केंद्र में भी कथक सिखाया, जो संगीत नाटक अकादमी की एक इकाई है। 1998 में वह यहां से फैकल्टी प्रमुख और निदेशक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। बाद में पंडित बिरजू महाराज ने दिल्ली में अपना डांस स्कूल कलाश्रम खोल लिया।
पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित बिरजू महाराज ने माखन चोरी, फाग बहार, कथा रघुनाथ की और कृषनयन सहित कई नाटकों में नृत्य निर्देशन भी किया था। शतरंज के खिलाड़ी , देवदास और बाजीराव मस्तानी जैसी फिल्मों के कुछ गानों का शानदार नृत्य निर्देशन भी उन्होंने ही किया। कला क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालीदास सम्मान, नृत्य विलास, राजीव गांधी सम्मान सहित कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया था।

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